इंसानी अक़दार का नुमाइंदा शायर : साहिर लुधियानवी
पटना: साहिर लुधियानवी का शुमार उर्दू के अज़ीम शुअरा में होता है , उन्होंने हमेशा मज़लूमों की दादरसी की, इंसानी दर्द व करब को महसूस किया , अमन की वकालत की और जंग की होलनाकियों से माशरे को बाख़बर किया।
वाज़ेह रहे कि इन ख़यालात का इज़हार सद्र शोबा-ए-उर्दू वीमेंस कॉलेज डॉक्टर रियाज़ अहमद ने तालिबात के माहाना प्रोग्राम में सदारती कलिमात के तहत किया। हक़ीक़त यह है कि साहिर ने रोमान और एहतिजाज की आमेज़िश से अपनी इन्फ़िरादियत के साथ तरक़्क़ीपसंद तहरीक को एक नया ज़ाविया फ़राहम किया।
आप को बता दें कि पटना वीमेंस कॉलेज में तालिबात का हर माह पाबंदी से मौज़ूई सेमिनार होता है और यह सेमिनार उर्दू के मारूफ़ शायर साहिर लुधियानवी की शख़्सियत और शायरी से मुतअल्लिक था। हसब-ए-रिवायत प्रोग्राम का आग़ाज़ बी ए सेकंड सेमेस्टर उर्दू की तालिबा उम्मे हबीबा के तिलावत कलाम-ए-पाक से हुआ ।
उस के बाद रिसालत मआब में तहज़ीब ने नअत का नज़राना पेश किया जब कि निहां अनवर ने निज़ामत के फ़राइज़ अंजाम दिए- उस के बाद शोबे की तालिबात ख़नसा, साइम़ा, उम्मे हबीबा ,निहां अनवर ,तूबा सरवर, सबा , तहज़ीब और अदीबा ने साहिर लुधियानवी की शख़्सियत और उन की शायरी पर गुफ़्तगू की ।
नीज़ तालिबात ने साहिर की अदबी और फ़िल्मी नग़्मों पर इज़हार ख़याल किया। यह सच है कि साहिर की शायरी असरी हस्सियत की वजह से हर ज़माने की शायरी है। तालिबात ने साहिर के फ़न्नी महसिन पर ज़ोर देते हुए कहा कि साहिर की शायरी में रवानी और बरजस्तगी की कैफ़ियत नमायां है।
साहिर शिद्दत व हिद्दत के साथ इंसानियत की तरक़्क़ी चाहते हैं । अलबत्ता पैग़ाम की तरसील में उनका लहजा कहीं कहीं सख़्त हो गया है, लेकिन जब नियत में ख़ुलूस हो तो लहजे का सख़्त हो जाना फ़ितरी बात है।
साहिर ने जहां अपनी शायरी और फ़िल्मी नग़्मों के ज़रिये समाजी नाइंसाफ़ियों पर सवाल उठाए तो वहीं रिवायती हुस्न व इश्क़ से हट कर हक़ीक़त निगारी पर मब्नी गीत भी लिखे – साहिर की शायरी में रोमान और इंक़िलाब का एक संगम नज़र आता है-
बादअज़ां शोबे की उस्ताज़ डॉक्टर ताहिरा अंजुम ने साहिर लुधियानवी की शअरी अज़मत व इन्फ़िरादियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि साहिर शायरी इंसानी अक़दार की नुमाइंदगी , और असरी मसाइल से हमआहंगी की वजह से हर ज़माने की शायरी है। वह जितनी माज़ी से हमआहंग है हाल से भी उतनी ही जड़ी हुई है।
इस तरह यह कहा जा सकता है कि साहिर की शायरी में माज़ी का नौहा भी है और मुस्तक़बिल की बशारत भी। और आख़िर में निहां अनवर के कलिमात-ए-शुक्र के साथ सेमिनार का अपने इख़्तिताम को पहुंचा



