फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू के एक अज़ीम शायर और मोतबर नक़्क़ाद थे। उन्होंने रिवायती उर्दू ग़ज़ल को एक नई सिम्त अता की और अपने मख़सूस फ़लसफ़ियाना उस्लूब के बाइस उर्दू शायरी की तारीख़ में हमेशा के लिए लाज़वाल बन गए। इन ख़यालात का इज़हार सद्र शोबा-ए उर्दू, पटना विमेन्स कॉलेज, डॉक्टर रियाज़ अहमद ने तालिबात के माहाना मौज़ूई सेमिनार में किया। वाज़ेह रहे कि पटना विमेन्स कॉलेज में शोबा-ए उर्दू की तालिबात की जानिब से हर माह सेमिनार का इनाक़ाद किया जाता है और आज का ये सेमिनार उसी सिलसिले की एक कड़ी है। प्रोग्राम की निज़ामत शोबा-ए उर्दू की तालिबात तूबा सरवर और उम्मे हबीबा ने मुश्तरका तौर पर की। प्रोग्राम का आग़ाज़ तूबा सरवर की तिलावत-ए कलाम-ए पाक से हुआ, उसके बाद तहज़ीब ने बारगाह-ए रिसालत मआब में नअत का ख़ूबसूरत नज़राना पेश किया। बाद अज़ाँ शोबा-ए उर्दू की तालिबात इरम, हिबा, तहज़ीब, ख़नसा, ख़ुशी, परवीन, सायमा, सबा और ख़ुशबू ने फ़िराक़ गोरखपुरी की शख़्सियत और उनकी शायरी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर रौशनी डाली।
प्रोग्राम में तालिबात के अदबी व तख़लीक़ी ज़ौक़ को निखारने पर भी तवज्जो दी जाती है इसके तहत उम्मे हबीबा ने “औरत” के मौज़ू पर अपनी नज़्म पेश की जिसे हाज़िरीन ने बेहद पसंद किया। बादे अज़ाँ शोबा-ए उर्दू की उस्ताज़ डॉक्टर ताहिरा अंजुम ने फ़िराक़ गोरखपुरी की शख़्सियत और उनकी शेअरी अज़मत पर तफ़सील से रौशनी डाली और आख़िर में इरम के इज़हार-ए तशक्कुर के साथ प्रोग्राम अपने इख़्तेताम को पहुँचा।



